बर्फ के अंदर दबा हुआ मिला “16 वर्ष बाद यह जवान”, 2015 में फहराया था तिरंगा चोटी पर….

अगर आपका कोई जान से भी ज्यादा चाहने वाला व्यक्ति आपकी नजरों से दूर हो जाए और आप उसका आखरी बार दीदार भी ना कर पाऊं तो आपको हमेशा यही आस लगी रहेगी कि वह 1 दिन वापस आएगा। लेकिन अचानक उसकी खबर आ जाए कि वह इस दुनिया में नहीं है या फिर किसी वजह से मिल नहीं पा रहा है तो आपको दिल पर पत्थर रखकर अपने आप को समझाना पड़ेगा कि वह वयक्ति इस दुनिया में नहीं है लेकिन वहीं दूसरी और आपके मन को ऐसा लगेगा कि शायद वहां एक बार फिर से वापस आ जाए मेरे पास।आज के सर्टिकन में हम आपको एक फौजी के बारे में बताने वाले हैं जिसका शव करीब 16 साल बाद बर्फ के अंदर दबा हुआ मिला।
आज हम आप सभी लोगों को गाजियाबाद के फौजी की कहानी सुनाने वाले हैं। जिनका शव उनकी मौत के ठीक 16 साल बाद उत्तराखंड में बर्फ के नीचे दबा हुआ मिला। पर्वतारोही फौजियों का एक दल सन 2005 की गंगोत्री हिमालय की सबसे ऊंची चोटी सतोपंथ पर तिरंगा फहराकर वापस लौट रहा था। रास्ते में संतुलन बिगड़ने के कारण उनके दल का एक हादसा हो गया। जिसमें करीब 4 जवान सैकड़ों फीट नीचे खाई में गिर गए थे और बाद में छानबीन के दौरान उस दल के एक जवान का शव नहीं प्राप्त हुआ था। इन सभी के साथ-साथ उनके माता पिता की एक आखिरी इच्छा थी कि उनके बेटे के आखरी बार दर्शन हो जाए अंतिम संस्कार से पहले ,लेकिन उनकी यह आस भी मानो आंसू बनकर रह गई।

अब 16 साल बाद जाकर जब परिवार वालों को उनका शव मिला तो उनके जख्मों मानो ताजा हो गए। उस गाजियाबाद के शहीद जवान के ड्रेस ,नेम प्लेट और शरीर भी काफी हद तक सुरक्षित प्राप्त हुआ क्योंकि वहां बर्फ के अंदर दबा हुआ था। परिवार ने भी शव की पहचान कर ली, करीब 2 दिन के बाद औपचारिकता पूरी करने के बाद उन्होंने शव का अंतिम संस्कार कर दिया। जवान अमरीश त्यागी गाजियाबाद के एक छोटे से गांव के रहने वाले व्यक्ति थे। यह गांव थाना मुरादनगर में आता है।

भारतीय सेना का एक 25 सदस्य की टुकड़ी स्वर्णिम दिवस के मौके पर सतोपंथ की चोटी पर विजय पताका फहराने के लिए 12 सितंबर को उत्तरकाशी के लिए रवाना हुए थे। जिस चोटी की ऊंचाई करीब 7075 मीटर है। अभियान के दौरान सेना के दल को 23 सितंबर को हर्षिल नाम की जगह के पास बर्फ में दबा अमरीश त्यागी का श-व मिला। इसे सेना के जवानों ने गंगोत्री पहुंचाया और पुलिस को सौंपा।

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