मकान मालिक अपने मन के अनुसार जब चाहे तब “खाली करा सकता है मकान” जाने सुप्रीम कोर्ट ने क्या दिए नए आदेश

अक्सर भारत देश में ऐसा देखा जाता है कि मकान मालिक और किराएदार के बीच में समझौता कमी होता है और ज्यादा तो लड़ाई देखी जाती है और जब बात किराए पर आ जाती है तो अन्य प्रकार के संविधान भी हैं भारत में जिसके तहत वह एक दूसरे के खिलाफ केस भी कर सकते हैं और अपनी बातें भी रख सकते हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अभी कुछ दिनों पहले एक ऐसा आदेश जारी किया है जिससे कि कुछ लोगों को नुकसान हुआ है और कुछ लोगों को फायदा जिसके बारे में आज हम आप सभी लोगों को बताने वाले हैं।

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की अपीलकर्ता (हिमालय विनट्रेड प्राइवेट लिमिटेड) ने एक संपत्ति खरीदने के लिए मालिक के साथ एग्रीमेंट किया था। सेल डीड (बिक्री विलेख) के माध्यम से अपीलकर्ता का उस संपत्ति के ऊपर स्वामित्व का अधिकार हो गया। सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रतिवादी (मोहम्मद जाहिद व अन्य) को उस संपत्ति के पूर्व मालिक द्वारा एक केयरटेकर के तौर पर नियुक्त किया गया था। वहीं पहले मालिक की तरफ से प्रतिवादी को उस संपत्ति पर निवास करने की अनुमति दी गई थी।

 प्रतिवादी ने एक मुकदमा दायर किया, जिसने इस बात का दावा किया गया था कि केयरटेकर के तौर पर उसका उस संपत्ति पर वैध कब्जा है और वह संपत्ति के एकमात्र मालिक है। उसने उसे संपत्ति के बेदखल करने से रोकने की के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की। वहीं इस मामले में सबसे दिलचस्प बात यह रही है कि उसके अनुसार निचली अदालत और हाईकोर्ट ने मकान मालिक की याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया था।

हम आप सभी लोगों को बता देना चाहते हैं कि अजय रस्तोगी और जस्टिस अवेओ को की पीठ ने यह बरट्रेड जज के एक आदेश के खिलाफ दायर एक अपील पर सुनवाई करने के दौरान कही वहीं अगर हम बात करें इस बात की तो रेल कोर्ट के द्वारा दिए गए आदेश की पुष्टि हुई और कोर्ट ने भी इसमें हामी भरी।

सबसे मुख्य विषय यह है कि ट्रायल जज ने इसे विवाद विषय वस्तु और उसकी याचिका सिर्फ मालिक के कहने पर लिखित बयान दर्ज किए जाने के बाद ही की जा सकती है जिसके तहत लोगों को काफी दिक्कत भी हो सकती है इसके आधार मानते हुए आवेदन को खारिज कर दिया गया और निचली अदालत ने कहा कि यह आदेश नियम 11 सिविल प्रक्रिया संहिता के दायरे में नहीं है।

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