क्या कारगिल के इस बहादुर सैनिक विक्रम बत्रा को देश के युवाओ ने भुला दिया ? आखिर कब याद करोगे इन्हे ?

सोशल मीडिया पर एक सवाल कई बार पूछा गया। सवाल यह है की क्या हमारा देश शहीदों की शहादत को यही भुला देता है ? ये सवाल इसीलिए पूछा जा रहाहै क्युकी 7 जुलाई 1999 को हमारी भारतीय सेना के बहादुर अफसर विक्रम बत्रा लड़ते लड़ते शहीद हो गए थे, और इस 7 जुलाई के दिन किसी ने भी उन्हें याद नहीं किया। अब ऐसे में लोग पूछ रहे है कि क्या यही अंजाम होता है देश के लिए शहीद होने वालो का।

हिमाचल प्रदेश के जन्मे विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितम्बर 1974 को उनका जन्म हुआ था। विक्रम बत्रा की बहादुरी के कारण उनके दुश्मन भी उन्हें शेरशाह के नाम से जानते थे। परमवीर चक्र विजेता कप्तान विक्रम बत्रा 7 जुलाई 1999 को कारगिल के युद्ध में शहीद हो गए थे। विक्रम बत्रा की शहादत के बाद जहा वह शहीद हुए थे उस जगह को पॉइंट 4875 छोटी कहा जाता है।

उस छोटी को बत्रा टॉप का नाम दे दिया गया है। हालांकि कारगिल युद्ध को 22 साल पूरे हो चुके है लेकिन इस युद्ध के हीरो के अदम्य साहस और वीरता के चर्चे है वो आज भी सेना सुनने में आते है। विक्रम बत्रा ने 1996 में इंडियन मिलटरी अकेडमी में दाखिला लिया था। 6 दिसंबर 1997 को कॅप्टन बत्रा जम्मू और कश्मीर के राइफल्स की तेरवी बटालियन में बतौर लेफ्टिनेंट शामिल हुए। कारगिल युद्ध में उन्होंने जम्मू कश्मीर राइफल्स की तेरवी बटालियन का नेतृत्व किया था।

20 जून 1999 को कप्तान बत्रा ने कारगिल की पॉइंट 5140 चोटी से दुश्मनो को खदेड़ने के लिए अभियान छेड़ा, और कई घंटो की गोलीबारी के बाद कामयाब हो गये। उसके बाद उन्होंने जीत का कोड बोला “यह दिल मांगे मोर”। आदम में वीरता और पराक्रम के लिए कमांडिंग अफसर लेफ्टिनेंट वाई के जोशी ने विक्रम को शेरशाह उपनाम से नवाज़ा था।

इस परमवीर सैनिक ने यह कहकर एक सैनिक को पीछे धकेल दिया की तू बाल बच्चेदार है पीछे हटजा मुझे आगे जाने दे, यह जज़्बा देश के लिए सीने पर गोली खाने का आज कल कहा देखने को मिलता है। यह कहा जाता है की उन्होंने अपने साथियो को बचाने के लिए खुद सीने पर गोलिया खायी। विक्रम बत्रा के आखिरी शब्द “जय माता दी” थे। वही कॅप्टन विक्रम बत्रा के परिजनों को अभी भी इस बात का मलाल है कि उनके बेटे कि इस शहादत को किसी पाठ्यक्रम में नहीं जोड़ा गया है।

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