ओडिसा के सड़क पर खाने का ठेला लगाने वाले परिवार के किशोर पात्रा ने दी अपनी फूटी किस्मत को मात और करा 2 करोड़ का धंदा लॉकडाउन में

किशोर पत्र की साथ लोगो का परिवार था और यह पैसे कमाने के लिए खाने का ठेला लगाया करते थे। जो उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था, ज़िन्दगी में ऐसा कुछ फिर उनके साथ हुआ था। 2004 में किशोर ने पहली बार बॉम्बे में कदम रखा था और उनकी जेब में सिर्फ 860 रुपये थे। किशोर उड़ीसा के रहने वाले थे

दोस्तों आज हम आपके लिए लाये है किशोर पात्रा की ज़िन्दगी की कहानी। आखिर कैसे एक ओडिसा का गरीब लड़का बॉम्बे में आकर बना करोड़पति। किशोर पात्रा ओडिसा के रहने वाले है। कभी कभी ज़िन्दगी में ऐसे मोड़ आते है जब ज़रूरतों के आगे हमे अपने सपनो को तोड़े समय के लिए भूलना पड़ता है, पढ़ाई लिखाई छोड़ देनी पड़ती है, ऐसे में आप चाहे या न चाहे पर आपके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता।

किशोर की ज़िन्दगी भी कुछ इसी तरह बीती थी। किशोर पात्रा अपने 5 भाई बहन और माता-पिता के साथ रहते थे। उनके घर का खर्च सर एक खाने के ठेले से चलता था जो वह सुबह के समय सड़क के किनारे लगाते थे। उनके परिवार में जब दो बहनो की शादी करनी पड़ी तो उनपर काफी कर्जा हो गया था। तब जाकर उनके पिता ने फैसला लिया की वह उनके भाई को काम के लिए पूने भेजेंगे।

फिर कुछ समय बाद उनका दूसरा भाई भी पूने चला गया और साथ काम करने लगे। किशोर ने सिर्फ दसवीं तक पढ़ाई करि और फिर वह भी अपने पिता के साथ ठेला चलने लग गए। लेकिन कुछ समय बाद वह भी अपने बड़े भाइयो के साथ पूना में एक फैक्ट्री में काम करने लग गए। उस कंपनी में सोडा और मिनरल वाटर का काम होता था।

किशोर अपनी मेहनत के दम पर उस कंपनी में जर्नल मैनेजर बन गए और पूरा काम सँभालने लग गए। कुछ समय बाद उनकी कंपनी की MD का दिहांत होगया और उनके परिवार ने कंपनी को बंद करदिया। किशोर फिरसे बेरोजगार होगये और नए जगह काम ढूंढ़ने लग गए लेकिन उन्हें कोई भी काम नहीं मिला। कुछ समय बाद उनके बड़े भाई के सीनियर ने किशोर को बॉम्बे बुला लिया। 2004 में किशोर के पास बस 860 रूपए थे और वह अपने भाई के दोस्त के घर ही रहने लगे। स्टेशन के पास एक चाय का कट्टा था वह पर काफी बिजनेसमैन आते थे और अपनी बाते करा करते थे।

किशोर भी वह जाकर घुलने मिलने लग गया और फिर किसी ने उन्हें एक काम दिया। उन्हें SBI में क्रेडिट कार्ड बेचने का काम मिल गया लेकिन दोस्तों उस समय लोगो को डेबिट कार्ड तक का ढंग से पता नहीं था तो यह काम उनके लिए नया और काफी कठिन था। सभी में एक उनकी सीनियर लड़की थी जिन्होंने किशोर को काम सिखाया और किशोर ने काफी मेहनत करके अपनी ज़िन्दगी को पटरी पर ले आये। धीरे धीरे किशोर और उसके दोस्त ज्यादा वेतन के लिए अपनी जॉब बदलते रहे। 2006 में फिरसे जब बेरोजगारी आयी तो किशोर को फिरसे अपने काम से हाथ धोना पड़ा।

जल्द ही वह फिरसे खाली होगये। वह दूध पीकर ही दिन निकालते थे। उनके पिताजी ने उन्हें एक बार कॉल करके पूछा और जब उन्होंने यह सब बताया तो उन्होंने उसे वापस ओडिसा आने को कहा। लेकिन किशोर ने ठान लिया था कि वह वापस नहीं जायेंगे और यही रहकर मेहनत करेंगे। कुछ समय बाद उनको फिरसे एक बैंक में काम मिल गया और उनकी ज़िन्दगी चलने लगी।

उन्होंने इस बार और मेहनत के साथ काम करा क्युकी वह नहीं चाहते थे उन्हें वह बेरोजगारी के दिन दोबारा देखने पड़े। 2010 में किशोर पात्रा ने शादी कर ली और फिर किशोर और उनकी पत्नी दोनों काम करने लग गए थे। लेकिन उनकी किस्मत उतनी अच्छी नहीं थी, 2012 में वह करीब करीब स्थिर हो गए थे और उनकी एक लड़की भी हुई थी। गर्भवती होने के कारण उनकी पत्नी घर पर थी, और फिर किशोर का एक हादसा हुआ जिसमे उनकी बहिन का दिहांत होगया, किशोर का एक हाथ भी बुरी तरह टूट गया लेकिन डॉक्टर ने उन्हें बचा लिया।

इस बार वह फिरसे बेरोजगार होगये थे और अपने घर का खर्च चलने के लिए वह अपने जवाहरात बेचने लग गए। वह लोग एक बार खाना बनाते थे और दो समय खाते थे, छोटे बच्चे के लिए अलग से करना पड़ता था लेकिन उन्ही हालत बहुत ख़राब थी और उनके ऊपर 20 लाख करीब कर्जा भी हो गया था। 2014 में फिसरे उन्हें एक अच्छा काम मिला और वह फिरसे अपनी ज़िन्दगी सुधरने में लग गए। करीब करीब चार साल में उन्होंने अपने सारे कर्जे उतार दिए।

लेकिन इस बार उन्हें यह बेचैनी थी कि कही वह फिरसे जीरो पर न आ जाए। उस समय किशोर ने सोचा क्यों न दुसरो के लिए काम करने से अच्छा वह अपना ही धंदा शुरू करे। उन्होंने एक फ्रैंडली पेंसिल का काम शुरू किया। 2018 में किशोर और उनका बॉम्बे का पहला दोस्त मिलकर काम चलाने लग गए। किशोर ने तीन महीने तक अपनी जॉब नहीं छोड़ी उन्होंने सोचा कि जब तक वह अपने वेतन के करीब होने धंदे से नहीं कमा लेते तब तक जॉब करेंगे।

बेटी बड़ी हो गयी थी इसीलिए घर का रेहन सेहन भी काफी बदल गया था वह अब एक अच्छी ज़िन्दगी जी रहे थे इसीलिए उन्होंने काफी EMI भी देनी होती थी। तीन महीने के बाद वह सब ठीक कर चुके थे और फिर उन्होंने जॉब छोड़ दी और वह सुबह नास्ता कही करते थे तो रात का खाना किसी और शहर में। उन्हें अपने धंदे में मजा आ रहा था क्युकी सब ठीक चल रहा था। लेकिन एक बार फिरसे 2018 में जब किशोर और उसके दोस्त बॉम्बे के बाहर थे, तब बॉम्बे में बारिश बहुत हुई और उनका करीब 27 लाख तक का माल खराब होगया। उनके दोस्त किशोर को हिम्मत दे रहे थे और किशोर अपने दोस्त को लेकिन दोनों अंदर से टूटे हुए थे। फिर 2019 में उन्होंने लौक्डॉन के बारे में सुना, तब यह भारत में नहीं बल्कि दूसरे किसी विदेश में हुआ था।

तो उस वदेशी कंपनी ने इनसे सामान लेने से मना करदिया था तो किशोर ने सोचा कि अब फिरसे जीरो पर आगये है तो अब क्या करे। उस समय वह छोटे पैमाने पर काम करने लगे। उसी समय उन्होंने अपना app डाउनलोड किया था कुछ बॉम्बे के ही कर्मचारी रखने के लिए। सिर्फ दो महीने ही हुए थे कि उन्होंने करीब 12-13 लाख का धंदा कर लिया था। लेकिन फिरसे ज़िन्दगी ने उनकी परीक्षा ली और पुरे देश में लाकडाउन लग गया। यह फिरसे उनके लिए एक बड़ा झटका था। जब पहली बार लॉकडाउन लगा तो उनके पास इतना समय था कि वह अपनी गलतिया सुधार सके देख सके कि कौन कौन सी चीजे उन्हें करनी चाहिए और कौन सी नहीं।

उन्होंने सोचा इस बार क्यों न फार्मा सेक्टर में काम किया जाए, उनको इस बारे में ज्यादा ज्ञान नहीं था। उन्होंने padman फिल्म देख कर वह काम शुरू किया और तोडा बहुत सही चलने लगा। Apna app में वह एक ग्रुप से जुड़े, वह किसी ने काम शुरू करने के लिए कुछ पूछा तो किशोर पात्रा ने अपनी ज़िन्दगी का बताया और कुछ अच्छी बातो से उसका उत्तर दिया।

काफी लोगो ने उनको सहारा और फिर एक दिन Apna कि टीम से उन्हें कॉल आया कि आप हमारे लिए इन्फ्लुएंसर बन जाये क्युकी आपकी काफी पोस्ट्स पर लोगो का ध्यान आकर्षित होता है। सिर्फ 15 दिनों में वह पहले इन्फ्लुएंसर बन गए और फिर धीरे धीरे वह आगे बढ़ने लग गए।

लोखड़ौन खत्म होने के बाद उन्होंने फिरसे अपनी सेनिटरी नैपकिन का काम शुरू किया। लॉकडाउन के दोबारा आने पर उन्हें कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ा क्युकी इस बार वह हर मुश्किल के लिए तैयार थे और उन्हने पूरी तरह अपनी ख़राब किस्मत को मात दे दी।

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