जानें कैसे उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में मंदिरों में चढ़ाये गए फूलों और पूजा के के सामान को खाद में बदल रहे शहर के मंदिर

शहर स्थित मंदिरों में फूलों की बर्बादी होती है, और श्रावण के पवित्र महीने और नवरात्रि उत्सव के दौरान समस्या और बढ़ जाती है। हालांकि, शहर के प्रसिद्ध मनकामेश्वर मंदिर के प्रबंधन ने इससे निपटान के लिए इन-हाउस कंपोस्टिंग यूनिट स्थापित करके फूलों की बर्बादी की समस्या को दूर करने की योजना तैयार की है।

श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर में चढ़ाये गए फूलों की बर्बादी रोकने के लिए मंदिर प्रशासन ने उठाये ये कदम

मनकामेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी, ब्रह्मचारी श्रीधरानंद कहते हैं, “हमने मंदिर के श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाये गए फूलों वा पूजा के सामान को ऐसे ही कहि भी फेंकने की बजाय इसे प्राकृतिक पदार्थों की मदद से खाद में बदलने की एक नई योजना तैयार की है।” उन्होंने कहा, “शुरुआत में, कानपुर स्थित एग्रो यूनिट मंदिरों में चढ़ाये गए फूलों, पत्तियों और मालाओं के निपटान का काम संभाल रही थी, लेकिन यूनिट के कर्मचारियों ने कोरोना महामारी के दौरान काम करना बंद कर दिया और जिसके बाद, मंदिर के कर्मचारियों ने पुष्प और पूजा के सामान को खाद में बदलने की योजना तैयार की।”

कैसे बदला जाता है इन फूलों को खाद में

प्रक्रिया सरल है। मंदिर में इक्कठे किये गए श्रद्धालओं द्वारा चढ़ाये गए पत्तियों, फूलों और मालाओं की मात्रा को डिब्बे में एकत्र किया जाता है। वह या तो लैंडफिल या बड़े ड्रम में जाता है जिसमें पानी को सोखने और प्राकृतिक पदार्थों को जोड़ने का सिस्टम होता है| उसमे एक निश्चित अवधि के बाद इसको जैविक में बदलने और स्वच्छ खाद का उत्पादन करने की व्यवस्था होती है, ”मनकामेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी ने बताया। उन्होंने कहा, “कई लोग मंदिर परिसर में पौधे उगाने के लिए प्राकृतिक खाद की तलाश में पहुंचते हैं।”

तथ्य यह है कि, शहर के अधिकांश प्रमुख मंदिरों ने फूलों की बर्बादी के मुद्दे से निपटने के लिए अब अपने परिसर में उत्पन्न फूलों और रसोई के कचरे को खाद में बदलना शुरू कर दिया है। मंदिर के अधिकारियों ने यह भी दावा किया कि उनके पास कंपोस्टर्स के बारे में विचार हैं, जिन्हें दक्षिणी राज्यों के कई मंदिरों में स्थापित किया जा रहा था, लेकिन हमने चढ़ाये गए फूलों को विघटित करने के लिए प्राकृतिक प्रक्रिया को चुना है।

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