यूपी के भाइयों ने 200 क्विंटल मवेशियों के कचरे को वर्मीकम्पोस्ट में बदला, 20 लाख रुपये प्रति वर्ष कमाएं

परंपरागत रूप से, उत्तर प्रदेश के सिखर के ग्रामीणों ने खाना पकाने के लिए ईंधन के रूप में उपयोग करने के लिए गाय के गोबर और लकड़ी सहित अन्य जैविक सामग्री पर भरोसा किया था। हालांकि, जब केंद्र सरकार ने उज्ज्वला योजना की घोषणा की और सब्सिडी के एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति की, तो खाना पकाने में गाय के गोबर का उपयोग ख़तम हो गया।

गाय के गोबर से शुरू किया रोज़गार, आज कमा रहे हैं लाखों

इसका तत्काल प्रभाव यह हुआ कि ग्रामीणों ने गाय के कचरे को छांटना बंद कर दिया। और इस वजह से गाँव की स्वच्छता की स्थिति बिगड़ने लगी। गाय का गोबर सड़कों पर पड़ा था, और पानी के स्रोत दूषित हो गए, जिससे बीमारियों का जन्म हुआ। बारिश के दौरान समस्या और बढ़ जाती है, क्योंकि मवेशियों का कचरा नदी में और गांव के साथ बहने वाले नालों में मिल जाता है।

इसके अलावा, आगंतुकों और निवासियों के रिश्तेदारों ने गांव में आना बंद कर दिया। गाँव में सन्नाटा छा गया, और सामाजिक कार्यक्रमों और समारोहों का आयोजन करना मुश्किल हो गया|

झेली बहुत यातनाएं लेकिन नहीं मानी हार

लेकिन अब परिदृश्य बदल गया है क्योंकि इन दोनों भाइयों मुकेश और चंद्रमौली ने गाय के खचरे का इलाज धुंध लिया है, और वे हर वर्ष 200 क्विंटल जानवरों के कचरे को वर्मीकम्पोस्ट में बदलकर 20 लाख रुपये प्रति वर्ष की कमाई कर रहे हैं| उनकी इस पहल ने उन्हें एक बहुत ही अच्छा रोज़गार तो दिलाया ही है, साथ ही सिखर को सूरत भी बदल दी है| उनके इस कदम से क्षेत्र में स्वच्छता के स्तर को सामान्य करने में मदद मिली है, और किसान अब स्वस्थ जीवन शैली के लिए जैविक खेती का अभ्यास कर रहे हैं।

जब दोनों भाइयों ने यह व्यवसाय शुरू किया तो पहले उन्हें बहुत यातनाएं झेलनी पड़ी| सभी उनका मज़ाक उड़ाते थे, उन पर हँसते थे की पढ़े लिखे होकर ऐसा काम कर रहे हैं| लेकिन फिर भी दोनों ने हार नहीं मानी, और जी तोड़ मेहनत से अपना व्यवसाय शुरू किया| जब सबने उन्हें तरक्की करते व गांव की सूरत बदलते देखा, तो सबके मुँह अपने आप बंद हो गए|

Leave a comment

Your email address will not be published.